ना नौकरी, ना ज़रूरी शिक्षा, तो कैसे मिले रोज़गार- लोकसभा चुनाव 2019
''अगर 38 साल के पीएचडी धारक शख़्स को नौकरी नहीं मिल रही है तो इस पर सवाल होना चाहिए कि देश और राज्य का भविष्य क्या होगा?''
बेरोज़गारी के प्रभाव को लेकर सवाल पूछने पर महाराष्ट्र के नांदेड़ के रहने वाले चंद्रकांत गजभरे ने तपाक से ये जवाब दिया. चंद्रकांत पीएचडी कर रहे हैं और उन्हें पैसे कमाने के लिए ऑटोरिक्शा चलाना पड़ता है.
चंद्रकांत 15 सालों से नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उनके पास समाज विज्ञान में एमए की डिग्री है. उन्होंने दो बार नेट-सेट की परीक्षा दी है और अब उनकी पीएचडी भी पूरी होने वाली है.
फिर भी उनके पास एक निश्चति आय का ज़रिया नहीं है जिससे उनकी मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो सकें.
चंद्रकांत ने नौकरी के लिए हर तरह की कोशिश की. उन्होंने होटल में वेटर तक का काम किया. दूसरे शहरों में भी नौकरी ढूंढने की कोशिश की लेकिन किराये पर रहने के कारण उनके लिए पैसे बचाना मुश्किल हो गया था. इसलिए वो वापस नांदेड़ चले आए.
उन्होंने दिन में ऑटो चलाने का कारण बताया. चंद्रकांत बताते हैं, ''मेरे जैसे लोगों के लिए शिक्षा ही जीने का एकमात्र रास्ता है. इसलिए मैंने उच्च शिक्षा हासिल की पर मुझे इससे जुड़ी नौकरी नहीं मिली. ऐसे में दूसरे शहर में जाकर किसी कंपनी या होटल में काम करने के बजाय मैंने इसी शहर में रहकर कमाने का फैसले किया.''
चंद्रकांत के लिए कोई भी काम छोटा नहीं है. वह मानते हैं कि किसी भी पेशे को नीची नज़रों से नहीं देख जाना चाहिए. हालांकि, वो अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे और नौकरी की तलाश करते रहेंगे.
चंद्रकांत अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो उच्च शिक्षा पाने के बाद भी अजीविका के लिए संघर्ष कर रहें हैं. यहां के युवाओं से बात करने पर पता चलता है कि बेरोजगारी किस स्तर पर है और किस तरह की है.
पढ़ाई के लिए नांदेड़ आने वाले अधिकतर युवा ग्रामीण इलाकों से होते हैं. इनमें से कई युवा स्थायी भविष्य के लिए निजी कंपनियों के बजाय सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं. यहां तक कि वो इसके लिए कुछ सालों का इंतज़ार करने के लिए भी तैयार रहते हैं.
कंप्यूटर साइंस की डिग्री वाले पंकज कुमार सोनकांबली ने भी सरकारी नौकरी करना चाहते हैं. उन्होंने स्टेनोग्राफर और इलैक्ट्रिशियन का भी प्रशिक्षण लिया है. लेकिन, उन्हें लगता है कि ये योग्यता नौकरी के लिए काफी नहीं है.
सरकारी नौकरी की चाह को लेकर वह कहते हैं, ''निजी कंपनियों में पहले अनुभव के बारे में पूछा जाता है. हमारे पास अनुभव नहीं है इसलिए हमें मौका नहीं मिलता.''
पंकज कुमार बताते हैं, ''हमने डिग्री कोर्स में कंप्यूटर की सी, सी++, ओरेकल लैंग्वेज पढ़ी हैं. लेकिन, ये लैंग्वेज लंबे समय पहले ही चलन से बाहर हो चुकी हैं. अगर आज हम नौकरी ढूंढने जाते हैं तो एंड्रॉयड, जावा के बारे में पूछा जाता है. अब मरे पास और कोई कोर्स करने या प्रशिक्षण के लिए पैसा नहीं है.''
बीसीए की डिग्री रखने वाले भूषण कांबले का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है. वह शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ''अगर हमें डिग्री के साथ आधुनिक जानकारी मिलती तो नौकरी के बाजार में आज हमारा भी कोई महत्व होता. हर कोई अतिरिक्त कोर्स नहीं कर सकता.''
भूषण इस बात पर भी जोर देते हैं कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में सिर्फ आरक्षण देना काफी नहीं है. वह कहते हैं, ''इस बात को लेकर गलतफहमी है कि आरक्षण से नौकरी की गारंटी मिलती है. ऐसा नहीं है. अगर कोई आरक्षण के तहत आता भी है तो उसे नौकरी पाने और काम करने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है.''
नौकरी की तलाश कर रहीं लड़कियों की कहानी कुछ और ही है. पेशे से इंजीनियर और सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहीं स्याली भरद कहती हैं कि आज भी महिलाएं कई तरह की मुश्किलों का सामना करती हैं.
वह कहती हैं, ''अगर हमें किसी और शहर में जाकर काम करना हो तो उसके लिए परिवार का बहुत दबाव झेलना पड़ता है. वो आसानी से इसके लिए नहीं मानते. मैंने पुणे में एक साल तक काम किया है लेकिन मुझे कुछ कारणों से वापस जाना पड़ा. मेरे परिवार का मानना है कि लड़कियों के लिए सरकारी नौकरी ही ज़्यादा सही है क्योंकि उसमें निजी कंपनियों जैसा काम का बोझ नहीं होता.''
बीएड और एमए कर चुके आनंद भिसे इस समस्या के एक अलग पक्ष की बात करते हैं. वह कहते हैं, ''नांदेड़ में अच्छे शिक्षण संस्थान हैं और यहां जो प्रशिक्षण मिलता है वो सरकारी नौकरी के लिए काफ़ी है. यहां कई कॉलेज भी हैं लेकिन उद्योग नहीं हैं और इसलिए यहां नौकरियां भी नहीं हैं.''
बेरोज़गारी के प्रभाव को लेकर सवाल पूछने पर महाराष्ट्र के नांदेड़ के रहने वाले चंद्रकांत गजभरे ने तपाक से ये जवाब दिया. चंद्रकांत पीएचडी कर रहे हैं और उन्हें पैसे कमाने के लिए ऑटोरिक्शा चलाना पड़ता है.
चंद्रकांत 15 सालों से नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उनके पास समाज विज्ञान में एमए की डिग्री है. उन्होंने दो बार नेट-सेट की परीक्षा दी है और अब उनकी पीएचडी भी पूरी होने वाली है.
फिर भी उनके पास एक निश्चति आय का ज़रिया नहीं है जिससे उनकी मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो सकें.
चंद्रकांत ने नौकरी के लिए हर तरह की कोशिश की. उन्होंने होटल में वेटर तक का काम किया. दूसरे शहरों में भी नौकरी ढूंढने की कोशिश की लेकिन किराये पर रहने के कारण उनके लिए पैसे बचाना मुश्किल हो गया था. इसलिए वो वापस नांदेड़ चले आए.
उन्होंने दिन में ऑटो चलाने का कारण बताया. चंद्रकांत बताते हैं, ''मेरे जैसे लोगों के लिए शिक्षा ही जीने का एकमात्र रास्ता है. इसलिए मैंने उच्च शिक्षा हासिल की पर मुझे इससे जुड़ी नौकरी नहीं मिली. ऐसे में दूसरे शहर में जाकर किसी कंपनी या होटल में काम करने के बजाय मैंने इसी शहर में रहकर कमाने का फैसले किया.''
चंद्रकांत के लिए कोई भी काम छोटा नहीं है. वह मानते हैं कि किसी भी पेशे को नीची नज़रों से नहीं देख जाना चाहिए. हालांकि, वो अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे और नौकरी की तलाश करते रहेंगे.
चंद्रकांत अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो उच्च शिक्षा पाने के बाद भी अजीविका के लिए संघर्ष कर रहें हैं. यहां के युवाओं से बात करने पर पता चलता है कि बेरोजगारी किस स्तर पर है और किस तरह की है.
पढ़ाई के लिए नांदेड़ आने वाले अधिकतर युवा ग्रामीण इलाकों से होते हैं. इनमें से कई युवा स्थायी भविष्य के लिए निजी कंपनियों के बजाय सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं. यहां तक कि वो इसके लिए कुछ सालों का इंतज़ार करने के लिए भी तैयार रहते हैं.
कंप्यूटर साइंस की डिग्री वाले पंकज कुमार सोनकांबली ने भी सरकारी नौकरी करना चाहते हैं. उन्होंने स्टेनोग्राफर और इलैक्ट्रिशियन का भी प्रशिक्षण लिया है. लेकिन, उन्हें लगता है कि ये योग्यता नौकरी के लिए काफी नहीं है.
सरकारी नौकरी की चाह को लेकर वह कहते हैं, ''निजी कंपनियों में पहले अनुभव के बारे में पूछा जाता है. हमारे पास अनुभव नहीं है इसलिए हमें मौका नहीं मिलता.''
पंकज कुमार बताते हैं, ''हमने डिग्री कोर्स में कंप्यूटर की सी, सी++, ओरेकल लैंग्वेज पढ़ी हैं. लेकिन, ये लैंग्वेज लंबे समय पहले ही चलन से बाहर हो चुकी हैं. अगर आज हम नौकरी ढूंढने जाते हैं तो एंड्रॉयड, जावा के बारे में पूछा जाता है. अब मरे पास और कोई कोर्स करने या प्रशिक्षण के लिए पैसा नहीं है.''
बीसीए की डिग्री रखने वाले भूषण कांबले का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है. वह शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ''अगर हमें डिग्री के साथ आधुनिक जानकारी मिलती तो नौकरी के बाजार में आज हमारा भी कोई महत्व होता. हर कोई अतिरिक्त कोर्स नहीं कर सकता.''
भूषण इस बात पर भी जोर देते हैं कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में सिर्फ आरक्षण देना काफी नहीं है. वह कहते हैं, ''इस बात को लेकर गलतफहमी है कि आरक्षण से नौकरी की गारंटी मिलती है. ऐसा नहीं है. अगर कोई आरक्षण के तहत आता भी है तो उसे नौकरी पाने और काम करने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है.''
नौकरी की तलाश कर रहीं लड़कियों की कहानी कुछ और ही है. पेशे से इंजीनियर और सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहीं स्याली भरद कहती हैं कि आज भी महिलाएं कई तरह की मुश्किलों का सामना करती हैं.
वह कहती हैं, ''अगर हमें किसी और शहर में जाकर काम करना हो तो उसके लिए परिवार का बहुत दबाव झेलना पड़ता है. वो आसानी से इसके लिए नहीं मानते. मैंने पुणे में एक साल तक काम किया है लेकिन मुझे कुछ कारणों से वापस जाना पड़ा. मेरे परिवार का मानना है कि लड़कियों के लिए सरकारी नौकरी ही ज़्यादा सही है क्योंकि उसमें निजी कंपनियों जैसा काम का बोझ नहीं होता.''
बीएड और एमए कर चुके आनंद भिसे इस समस्या के एक अलग पक्ष की बात करते हैं. वह कहते हैं, ''नांदेड़ में अच्छे शिक्षण संस्थान हैं और यहां जो प्रशिक्षण मिलता है वो सरकारी नौकरी के लिए काफ़ी है. यहां कई कॉलेज भी हैं लेकिन उद्योग नहीं हैं और इसलिए यहां नौकरियां भी नहीं हैं.''
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