भारतीय कार्डिनल जो 'यौन शोषण पीड़ितों को न्याय नहीं दिला पाए'

कैथेलिक चर्च के सबसे वरिष्ठ कार्डिनल और इस सप्ताह वेटिकन में बाल उत्पीड़न सुधार पर आयोजित एक बड़े सम्मलेन के चार आयोजनकर्ताओं में से एक का मानना है कि वो अपने पास आए उत्पीड़न की शिकायतों को बेहतर तरीके से देख सकते थे.

मुंबई के आर्चबिशप ओस्वल्ड ग्रेशस ने बीबीसी की एक पड़ताल के बाद दावा किया कि उन्होंने बाल शोषण के एक मामले में जल्द कार्रवाई नहीं की और पुलिस को आरोपों की जानकारी नहीं दी थी.

पीड़ितों और उनका समर्थन करने वालों का आरोप है कि भारत के सबसे वरिष्ठ पादरियों में से एक और वेटिकन में यौन शोषण पर सम्मलेन कराने वाले प्रमुख आयोजनकर्ताओं में शामिल कार्डिनल ओस्वल्ड ग्रेशस ने उत्पीड़न की उन शिकायतों को संजीदगी से नहीं लिया, जो उनसे की गई थीं.

भारत के कैथेलिक ईसाइयों का कहना है कि पादरियों द्वारा यौन शोषण के बारे में कैथेलिक चर्च में डर और चुप्पी की संस्कृति रही है. जिन्होंने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है, वो कहते हैं कि यह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी.

हमें दो अलग-अलग मामले मिले, जिसमें दावा किया गया कि तुरंत कार्रवाई और पीड़ितों को सहायता प्रदान करने के मामले में कार्डिनल विफल रहे हैं.

जिस शाम उनकी जिंदगी बदल गई, वो कुछ ख़ास नहीं थी. उनके बेटे ने चर्च की सभा से लौटने के बाद उनसे कहा कि पादरियों ने उसके साथ बलात्कार किया था.

उसकी मां ने बताया, "मैं समझ नहीं पा रही थी कि मुझे क्या करना चाहिए?" वो अभी भी नहीं जानतीं कि उन्हें क्या करना चाहिए, लेकिन इस घटना की वजह से उन्हें भारत के कैथेलिक चर्च से टकराव झेलना पड़ा.

वो जिस व्यक्ति के पास मदद के लिए पहुंची थी वह भारत के कैथेलिक चर्च के सबसे वरिष्ठ प्रतिनिधियों में से एक थे.

कथित बलात्कार की घटना के करीब 72 घंटे बाद परिवार को कुछ वक़्त के लिए कार्डिनल ओस्वल्ड ग्रेशस से मिलने का मौका मिला. कार्डिनल मुंबई के आर्चबिशप और तब वो कैथेलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया और फेडरेशन ऑफ एशियन बिशप कॉन्फ्रेंसेस के अध्यक्ष थे.

चर्च के भीतर लोग उन्हें अगला पोप मानते थे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वेटिकन में यौन शोषण पर इस सप्ताह आयोजित होने वाले विश्व शिखर सम्मेलन के चार प्रमुख आयोजकों में से वो एक हैं.

इस समय चर्च के भीतर यौन शोषण के मुद्दे को वेटिकन में हो रहे सम्मलेन में सबसे बड़ा संकट माना जा रहा है और कैथेलिक चर्चों की अखंडता इसके परिणाम पर निर्भर करती है.

बीते सालों में दुनियाभर के कैथेलिक चर्चों पर यौन शोषण के कई आरोप लगे हैं. ये आरोप उत्तर और दक्षिण अमरीका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में सुर्खियां भी बनीं लेकिन एशियाई देशों में इस समस्या के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.

भारत जैसे देशों में शोषण को एक सामाजिक कलंक समझा जाता है, जिसके ख़िलाफ़ मामला दर्ज करवाना खुद को बदनाम करने जैसा होता है.

इस देश के करीब 2.8 करोड़ की आबादी वाले ईसाई समुदाय में डर और मौन की संस्कृति के चलते समस्या की वास्तविकता को आंका नहीं जा सकता.

चार सदस्यीय आयोजन समिति में कार्डिनल ओसवल्ड ग्रेशस के सहयोगी और शिकागो के कार्डिनल ब्लेज़ कपिच ने वादा किया है कि रोम और दुनियाभर के प्रदेशों में बैठक के बाद कार्रवाई होगी ताकि बच्चों को इससे बचाया जा सके और पीड़ितों को न्याय मिल सके.

इस महत्वपूर्ण सम्मलेन के दौरान उन्हें दी गई इस ज़िम्मेदारी से भारत के कुछ लोग नाराज़ हैं. उनका कहना है कि बच्चों और महिलाओं को दुर्व्यवहार से बचाने का उनका पिछला रिकॉर्ड सवालों के घेरों में रहा है.

जो लोग उनके पास मदद के लिए पहुंचे थे, उनका कहना है कि उन्हें निराशा ही हाथ लगी थी.

पीड़ित बच्चे की मां का कहना है, "मैंने कार्डिनल को बताया कि पादरी ने मेरे बच्चे के साथ क्या किया है, मेरा बच्चा काफी दर्द में था. उन्होंने हमारे लिए प्रार्थना की और कहा कि उन्हें रोम जाना है."

"उस समय मेरे दिल को चोट पहुंची. एक मां होने के नाते मैं उनके पास काफी उम्मीद लेकर पहुंची थी कि वो मेरे बेटे के बारे में सोचेंगे और मुझे न्याय मिलेगा लेकिन उन्होंने कहा कि उनके पास हमारे लिए वक़्त नहीं है. वो सिर्फ रोम जाने की चिंता कर रहे थे."

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